देश में मजदूरों की स्थिति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण एवं दुखद है

The workers are facing a lot of trouble during the lockdown across the country.

देश में मजदूरों की स्थिति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण एवं दुखद है

                                        मजदूर एवं श्रमिक हमारे देश के उत्पादन एवं विकास का एक महत्वपूर्ण घटक है। दुर्भाग्य से वह आज वह सबसे ज्यादा गरीब एवं असुरक्षित है। पूरे देश में लॉक डाउन के दौरान मजदूरों को बहुत परेशानी हो रही है। गरीबों और मजदूरों का दर्द सरकार तक पहुंचना चाहिए। न जाने क्यों सरकार उनकी इस समस्या पर चुप्पी साधे हुए है ? मजदूरों एवं श्रमिकों  को उनके गांवों तक पहुंचाने की कोई व्यवस्था जरूर करनी चाहिए। यह सरकार का दायित्व है कि उन्हें, गरीब मजदूरों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जिसका कोई नहीं होता है, उनके लिए सरकार को गार्जियन की भूमिका निभानी चाहिए।

                                 कल मुंबई बांद्रा में घटित हुई घटना को देख कर बहुत दुख होता है। उसके कारण कुछ भी रहे हो, शायद किसी ने कुछ गलत अफवाह फैलाई हो या मजदूरों के घर जाने की मजबूरी उन्हें वहां पर खींच लाई हो। किंतु बहुत दुख होता है, यह देखकर की, जब भी गरीब मजदूर गांव जाने के लिए अपनी बात कहते हैं तो, बदले में उन्हें पुलिस की लाठियों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा उनके पास  दूसरा विकल्प यह है कि वह चाहे तो पैदल ही अपने गांव निकल पड़े। जो कि उससे भी ज्यादा भयानक एवं दुखदः है। कोरोना वायरस के कारण जब पहला लॉक डाउन घोषित हुआ। उस समय देश के हर हिस्से में फैले हुए गरीब मजदूर एवं श्रमिक वर्ग अपने आप को असुरक्षित एवं असहाय महसूस कर रहे थे। उसी परेशानी के चलते कई गरीब लोग, शहरों से गांव की ओर पैदल ही निकल गए। ट्रेन और बस से जाने के सभी साधन बंद थे। शायद उसके पास शायद इतनी पूंजी नहीं थी कि, जिसके बलबूते पर वह महानगर में बिना कार्य के रह सके। कोरोना वायरस की महामारी का डर अलग से उसे कमजोर कर रहा था। वह मंजर बहुत ही दर्दनाक था, कि गरीब मजदूर लोग अपने परिवार के साथ, जो भी कुछ सामान उनके पास था। उसे लेकर पैदल ही हाईवे से अपने गांव की ओर पर निकल पड़े । बहुत दुखद हुआ, कई लोगों की इस यात्रा में भूख एवं परेशानी से मौत भी हो गई।

                                  इसके बाद दिल्ली के आनंद विहार की घटना लो या आज का मुंबई ,बांद्रा  में मजदूरों का जमा होना। यह सब घटना, हमें एक बात बताती है कि हर स्थिति में गरीब मजदूर को ही सबसे ज्यादा मार खानी पड़ती है।

                                 बहुत ही दुखद एवं परेशानी भरी बात है कि इस वर्ग के लिए हम अभी तक उचित व्यवस्था नहीं कर पाए। उन्हें घर जाना था, उनकी इस परेशानी का हल नहीं निकाल पाए। जिन लोगों का यहां पर घर नहीं है। जो परिवार से अकेले हैं। जिनकी आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं है, गरीब है। उन्हें लगता है कि किसी भी तरह इस संकट के समय उन्हें अपने गांव, अपने परिवार के बीच चले जाना चाहिए। यह हम सब की नैतिक जिम्मेदारी है। उन्हें गांव तक पहुंचाने के लिए सहायता मुहैया करानी चाहिए। सरकार को इनके लिए कुछ व्यवस्था जरूर करनी चाहिए।

                               देश में जब भी किसी प्रकार की परेशानी आती है, और जब सरकार जनता के बारे में कुछ भी निर्णय लेती है। तो देश की आबादी के 30 प्रतिशत मजदूर एवं श्रमिक वर्ग का भी सरकार को विशेष रुप से ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि रेलवे, बस इन परिवहन की जिम्मेदारी सरकार के हिस्से में आती है। अतः ऐसे नाजुक समय में जब मजदूर एवं श्रमिक वर्ग अपने गांव जाना चाहता है। तो उसे किस तरह गांव पहुंचाने में मदद की जाए। इसका हल जरूर से निकाला जाना चाहिए। क्योंकि हर परेशानी के समय समाज का यह वर्ग ही सबसे ज्यादा परेशान होता है।

                                    महानगर के श्रमिकों एवं मजदूरों के पास ना तो अपना रहने के लिए मकान होता है। ना हीं किसी प्रकार का राशन कार्ड या आधार कार्ड होता है। जब लॉक डाउन के कारण फैक्ट्री या उनके कार्य का स्थल बंद हो गया है। उसके इनकम का साधन बंद हो गया है। अतः इस स्थिति में किस तरह वह शहर में रहकर सिर्फ सरकारी सहायता के बलबूते पर अपना जीवन यापन कर सकेगा। कोरोना वायरस की महामारी का डर उसे मानसिक रूप से कमजोर बना देता है। ऐसी स्थिति में सोचिए उसके गांव जाने का निर्णय कहां गलत है ?

                                 कोरोनावायरस की परेशानी एवं लॉक डाउन खत्म होने के बाद, हमें हमारी अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए श्रमिक की जरूरत पड़ेगी। उत्पादन में श्रमिक वर्ग का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान होता है। देश के कुल उत्पादन को बढ़ाने के लिए बिना मजदूर  एवं श्रमिकों हम आगे नहीं बढ़ सकते। अतः इस समय हमें इन्हें यथोचित मदद करके इनकी एक घर जाने की मांग को पूरा करने के लिए सरकार को उचित कदम उठाने चाहिए।

 

दीनदयाल मुरारका .