कोरोना वायरस: अनिश्चितता से भरा मानव भविष्य

Today we see that in a very short time the entire human race has been sitting in hiding all over the world by declaring lockdown, fearing death.

कोरोना वायरस: अनिश्चितता से भरा मानव भविष्य

            मानव हमेशा विश्व के हर क्षेत्र में, ज्ञान के अंतिम बिंदु तक विकास करने का दावा करता रहा है। आदमी अध्यात्म, ज्ञान, विज्ञान, टेक्नॉलॉजी पर  अपनी विजय के वर्चस्व का  आभास देता है। उसकी सामाजिक सोंच, प्रगतिशील विचारधाराएं, देशों की अपनी सीमाओं का विस्तार करना, सेना द्वारा परमाणु शक्ति से संपन्न होना। यह सब मनुष्य अपनी उपलब्धियों के तौर पर प्रस्तुत करता है। हथियारों का अनुसंधान, परिवहन के साधनों का विस्तार, मानव द्वारा हर क्षेत्र में अपने द्वारा किए गए विकास कार्यों का झंडा लहराने, अपनी भौतिक उपलब्धियों पर गौरवान्वित होना। इन सब उपलब्धियों बावजूद, आज हम देखते हैं कि बिल्कुल थोड़े ही समय में संपूर्ण मानव जाति पूरे विश्व मैं लॉक डाउन घोषित कर के, मृत्यु के भय से आइसोलेशन छुप कर बैठी हुई है।

            बड़ा आश्चर्य होता है कि वे हमारी सारी उपलब्धियां इतने कम समय में इतनी बेअसर कैसे हो गई? मानो उनका कोई वजूद ही ना रहा हो। अपने ज्ञान, पैसा एवं उपलब्धियों पर गौरवान्वित होने वाला मानव आज कोरोनावायरस के डर से घर में दुबका हुआ का बैठा है। आज किसी को भी अपनी प्रॉपर्टी, घर, दुकान, मकान, खेत खलियान, फैक्ट्री, ऑफिस, व्यवसाय, कारोबार या अपनी उपलब्धियों की कोई चिंता नहीं है। न हीं आज वह उसे जाकर देख सकता है, चिंता है तो सिर्फ उसे अपनी जिंदगी की, कोरोनावायरस की। या अपनी जान बचाने की। बिल्कुल छोटे से समय में कितना बड़ा परिवर्तन आ गया, की पूरी मानव जाति की सोच समझ एवं उसके विस्तार के निर्णय में फर्क आ गया। यह जो असर मानव जाति पर हुआ है, उसके दूरगामी परिणाम होंगे। मुझे नहीं लगता कोरोनावायरस इतनी जल्दी खत्म हो जाएगा। क्योंकि इसका इन्फेक्शन दुनिया में नजदीकी वर्षों में कहीं ना कहीं जरूर रहेगा, और फिर एक से दूसरे व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता रहेगा। कितना भी हम सोशल डिस्टेंसिंग एवं इसको ना फैलने के लिए सावधानी बरत ले। लेकिन मानव की भूख एवं उसकी मजबूरी हमारे इस सभी उपायों को निष्फल बना देती है।

              जिसका अनुभव हमने हमारे देश में पिछले एक महीनों में समय-समय पर देखा है। वह चाहे, लॉक डाउन के शुरुआत होने के बाद पूरे देश भर में मजदूरों द्वारा, एक साथ पैदल ही अपने गांवों के लिए निकलना हो, दिल्ली के आनंद विहार की घटना हो, या सूरत एवं मुंबई में मजदूरों का जमावडा होना हो। जब व्यक्ति भूखा होगा तो उसके सोचने समझने की सारी शक्ति खत्म हो जाती है। एक बात तय है कि, भूख से बड़ा कुछ नहीं होता। वह इंसान को कुछ भी करने के लिए मजबूर कर सकता है। आज हमारे सोचने समझने की शक्ति इसलिए बनी हुई है, क्योंकि शायद हमें खाने पीने, रहने एवं सुरक्षा के साधन उपलब्ध है।

             किंतु एक गरीब, दिहाडीं मजदूर, खेती में  काम करने वाला गरीब व्यक्ति, रोज काम कर कर जीवन गुजारने वाला श्रमिक वर्ग, सबसे पहले अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ेगा। वह सबसे पहले वह अपने खाने-पीने के साधनों की व्यवस्था करेगा।

             एक पल में किस तरह आदमी की सोच बदल जाती है। यह शायद जिंदगी का पहला अनुभव, हमारी पीढ़ी को हो रहा है। अतः कोरोनावायरस हमारे लिए कुछ सीख लेकर भी आया है, कि हमारे जिंदगी की सारी उपलब्धियां एकदम क्षणभंगुर है। हमें किसी भी बात पर गर्व नहीं करना चाहिए। न ही अपने आप को किसी भी व्यक्ति से बड़ा समझना चाहिए। क्योंकि परिस्थिति न जाने कब करवट ले, कि हम अपने से बहुत छोटे आदमी के साथ, एक स्तर पर आ जाएं। न जाने हमारी सारी उपलब्धियां कब खत्म हो जाए। और हमें अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़े। कोई नहीं जानता कि कब तक हम सुरक्षित हैं?और किस पल हमारे जिंदगी यात्रा आगे बढ़ेगी? आज यदि हम चिंतन करें तो एक समझने वाली बात है कि मानव को किसी भी मायने में किसी भी बात का गुरुर नहीं करना चाहिए। न जाने जीवन के किस मोड़ पर,कब हमारा जीवन समाप्त हो जाए? उस समय संभलने के लिए, एक क्षण का भी मौका किसी को भी नहीं मिलेगा। अतः आने वाले समय में हमें अत्यंत संयम एवं समझ के साथ काम लेना है। हमें यह सोचना है कि हम  जितना भी दूसरों का भला कर पाएंगे। ईश्वर उससे कहीं ज्यादा हमारी मदद करेगा।

दीनदयाल मुरारका.