चिंतन से ही चिंता का हल निकल सकता है

मनुष्य यह एक चिंतनशील प्राणी है। वह किसी भी कार्य को करने से पहले उसके बारे में सोचता है। वह कभी भी कोई कार्य, सामान्यतया बिना सोचे समझे नहीं करता है।

चिंतन से ही चिंता का हल निकल सकता है

 

मनुष्य यह एक चिंतनशील प्राणी है। वह किसी भी कार्य को करने से पहले उसके बारे में सोचता है। वह कभी भी कोई कार्य, सामान्यतया बिना सोचे समझे नहीं करता है। अतः जब मनुष्य किसी भी चिंता या परेशानी में होता है, तो उसे अपनी परेशानी कम करने के लिए, उस परेशानी के सभी पहलुओं पर सोचना पड़ता है। एवं यह सोच ही चिंतन है ।
यदि वह सूक्ष्म रूप से अपनी दिक्कत के बारे में सोचें तो निश्चित रूप से उसका हल उसे आसानी से मिल जाता है। अतः हमारी किसी भी चिंता का हल उसके चिंतन में छुपा हुआ है। आदमी जब चिंतन करता है। तो निश्चित रूप से वह थोड़ा शांति और सुकून के साथ उस प्रश्न या समस्या को देखता है। सामान्यता हमारे जीवन में कोई भी चिंता बिना किसी हल के नहीं होती है। हर प्रश्न का एक उत्तर होता है। जरूरत होती है, सिर्फ उसे खोजने की।
बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने मानव समाज की कई परेशानियों का, हल उसपर गहन चिंतन करके ही निकाला है। चिंतन से ही किसी समस्या का हल कैसे निकलता है? क्योंकि जब हम किसी परेशानी के बारे में थोड़ा ठंडे दिमाग से सोचते हैं। तो एक क्षण के लिए उस परेशानी के हल की ,अनेक संभावनाएं हमें नजर आती है, और हम अपने चातुर्य से उसमें से किसी एक हल का चयन कर लेते है।  चिंतन यह आदमी के पर्सनालिटी का एक हिस्सा होता है। कोई भी आदमी यह नहीं कह सकता कि वह किसी भी कार्य के बारे में सोचता नहीं है।
सोचना हमारे मन का एक भाग है। और मन की परिभाषा इस तरह की गई है कि, " मन कुछ और नहीं किंतु यह लगातार विचारों का प्रवाह है." अतः हमारा किसी भी विषय के बारे में विचार करना ही चिंतन है। कई बार हम लोग अपने चिंतन के बारे में गंभीर होते हैं। और कई बार उसे हल्के में लेते हैं। हमने देखा है कि हमारे समाज में अधिकतर लोग कोई भी निर्णय लेने से पहले उसके बारे में सोचते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जो किसी भी कार्य का निर्णय पहले लेते हैं और बाद में परेशानी आने के बाद फिर सोचते हैं। दुनिया में सभी प्रकार के लोग होते हैं। लेकिन इन सब के पीछे एक बात तय है, कि कभी भी किसी भी परेशानी चिंता या दुख का हल निश्चित रूप से चिंतन के बाद हम प्राप्त कर सकते हैं। यह हमारी सामाजिक सोच की प्रक्रिया का एक हिस्सा है। कि हम चिंतन को चिंता से दूर कर सकते हैं।

dyandyal-murarka

दीनदयाल मुरारका.